September 20, 2026 |

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जीराफूल की खुशबू और एक सपने की उड़ान पूर्णिमा की कहानी, जो लाखों महिलाओं की आवाज़ है

बलरामपुर कुछ साल पहले तक पूर्णिमा बासिन के लिए घर चलाना एक रोज़ की जद्दोजहद थी। खेत था, मेहनत थी लेकिन आमदनी उतनी नहीं थी कि बच्चों की फीस भर सकें या घर की ज़रूरतें बिना सोचे-समझे पूरी कर सकें। वही पूर्णिमा आज बलरामपुर-रामानुजगंज जिले में लखपति दीदी के नाम से जानी जाती हैं।

        बदलाव की शुरुआत हुई जब वे स्व-सहायता समूह से जुड़ीं। बैंक लिंकेज और सीआईएफ के ज़रिए उन्हें ऋण मिला और उन्होंने उस पैसे को किसी साधारण काम में नहीं लगाया। उन्होंने चुना जैविक खेती का रास्ता और उगाया जीराफूल चावल- एक पारंपरिक, सुगंधित किस्म जिसकी मांग आज पूरे प्रदेश में है।

“एक साल में 3 लाख रुपये की बिक्री हो चुकी है” यह आंकड़ा जब पूर्णिमा ने मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय को बताया, तो उनकी आंखों में जो चमक थी, वह किसी बैलेंस शीट से नहीं बल्कि वर्षों की मेहनत और आत्मविश्वास से जन्मी थी।

“अब बच्चों को बेहतर पढ़ा पा रही हूं” यही असली कमाई है

पूर्णिमा बताती हैं कि पैसे से बड़ी जो चीज़ उन्हें मिली, वह है बच्चों के लिए बेहतर कल की उम्मीद। आज वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला रही हैं, परिवार की ज़रूरतें आसानी से पूरी हो रही हैं और सबसे बड़ी बात, अब उन्हें किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता।

यह सिर्फ पूर्णिमा की कहानी नहीं है। बलरामपुर जिले में बरियों के गांधी समूह, दुर्गापुर के संतरा समूह और दुर्गा समूह जैसी महिलाएं हस्तशिल्प से लेकर खाद्य उत्पादों तक अपने हुनर को बाज़ार तक पहुंचा रही हैं।

   रविवार को जब मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने संयुक्त जिला कार्यालय परिसर में इन स्व-सहायता समूहों की प्रदर्शनी का अवलोकन किया, तो वे सिर्फ स्टाल नहीं देख रहे थे। वे उन हज़ारों हाथों की ताकत देख रहे थे जो एक समय खाली थे, और आज कुछ रच रहे हैं। उन्होंने 5 समूहों को बैंक लिंकेज के तहत 21 लाख रुपये के चेक भी प्रदान किए।

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