November 6, 2026 |

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शिक्षकों द्वारा सड़क पर बने गड्ढों का किया मरम्मत,,,जिला शिक्षा अधिकारी ने थमाया नोटिस…

राजपुर। बलरामपुर जिले के राजपुर शिक्षा विभाग के अंतर्गत आने वाले हायर सेकेंडरी स्कूल धंधापुर के दो शिक्षक और दो शिक्षिकाएँ अपने स्कूल आने-जाने के लिए कच्चे रास्ते की मरम्मत के मामले में जिला शिक्षा अधिकारी ने कारण बताओ नोटिस जारी किया है। शिक्षक और शिक्षिकाओं ने स्कूल आने जाने वाले कच्चे सड़क का मरम्मत करने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसके बाद जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है।

       बलरामपुर जिले और आसपास का इलाका लंबे समय से खराब सड़कों की समस्या से जूझ रहा है। नेशनल हाईवे-343 जहाँ पूरी तरह जर्जर हो चुका है,वहीँ आसपास के गाँवो में भी पहुँच मार्ग जर्जर स्थिति में है जिस कारण शिक्षकों को रोजाना स्कूल आने-जाने में कठिनाई होती थी। उन्होंने मजबूरी में सूरजपुर से जुड़ने वाले जंगल के रास्ते का सहारा लिया। यह रास्ता छोटा तो है, लेकिन उसमें जगह-जगह गड्ढे पड़े हुए थे।

         कक्षा लेने के लिए समय पर स्कूल पहुँचना और सुरक्षित घर लौटना सुनिश्चित करने के लिए शिक्षकों ने खुद ही कच्ची सड़क के गड्ढे भरने शुरू कर दिए। कुछ दिन पहले उन्होंने मिलकर रास्ते की मरम्मत कर ली ताकि आवागमन आसान हो सके। इसी दौरान किसी ने उनका वीडियो बना कर शोशल मीडिया में वायरल हो गया। तीन-चार दिन पहले यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। वीडियो में स्पष्ट दिख रहा है कि शिक्षक-शिक्षिकाएँ हाथ से गड्ढे भर रहे हैं। वायरल होते ही मामला प्रशासन तक पहुँच गया और इसे आधार बनाकर डीईओ ने कार्रवाई की है।

        जिला शिक्षा अधिकारी डी.एन. मिश्रा ने कहा कि शिक्षकों को नोटिस भेजा गया है और उनका जवाब मिलने के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। विभागीय सूत्रों के मुताबिक, अधिकारियों का मानना है कि इस तरह की गतिविधियाँ सरकारी कर्मचारियों की जिम्मेदारी से बाहर हैं और इसकी अनुमति लेना आवश्यक होता है।

        अब सवाल यह उठता है कि खराब सड़क की असली जिम्मेदारी किसकी है? क्या शिक्षकों को मजबूरी में सड़क सुधारने पर दंडित किया जाना चाहिए या प्रशासन को समय रहते सड़क मरम्मत की जिम्मेदारी उठानी चाहिए थी? स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क इतनी खराब है कि स्कूल, अस्पताल और अन्य आवश्यक सेवाओं तक पहुँचना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में शिक्षकों का कदम मजबूरी का परिणाम था, न कि नियमों की अवहेलना।

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